सरकारी विद्यालयों में गिरता नामांकन का स्तर

जब देश आजाद हुआ था तो उस समय देश की साक्षरता दर लगभग 30% के आसपास थी उस समय की सरकारों तथा शिक्षाविदों ने साक्षरता दर को बढ़ाने के लिए एक जन जागरण की पहल की,  जिसका परिणाम यह हुआ कि संपूर्ण भारत में सरकार के साथ-साथ आम लोगों ने भी शिक्षा के मंदिरों का निर्माण कराने के लिए आम लोगों से  चंदा इकट्ठा कर विभिन्न स्तर के विद्यालयों का निर्माण कराया तथा सरकारों ने उन विद्यालयों को मान्यता तथा शिक्षकों को किसी राज्य में 95% तथा किसी राज्य में 100% वेतन का भुगतान सरकारें करती आ रही हैं| इन विद्यालयों को प्रबंधक समिति के अर्द्ध सरकारी विद्यालयों के नाम से जाना जाता है| जिन विद्यालयों का निर्माण रख-रखाव, वेतन आदि सभी कार्य सरकारों ने किया ,उनको सरकारी विद्यालय के नाम से जाना जाता है |जहां पर सरकार उच्च योग्यता वाले शिक्षकों का विभिन्न परीक्षाओं के माध्यम से चयन करती है उनके बिल्डिंग, रख-रखाव, फर्नीचर, कर्मचारियों के वेतन ,बच्चों को निशुल्क पुस्तकें ,यूनिफॉर्म ,नगद आर्थिक मदद ,मिड डे मील,स्वच्छ पानी की सुविधा उपलब्ध कराती है |उसके बावजूद सरकारी तथा  अर्द्ध सरकारी विद्यालयों की स्थिति ऐसी है कि इन विद्यालयों में लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए भेजना पसंद नहीं कर रहे हैं| इसके पीछे क्या कारण है?ऐसा क्यों हो रहा है? कभी आपने सोचा है इसका जिम्मेदार कौन है ?इस समस्या का मूल क्या है?निम्न बिंदुओं के माध्यम से इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास किया गया है:-
1 झूठा एवं बेबुनियादी दिखावा:- वर्तमान स्थिति ऐसी हो गई है कि लोगों  का गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की ओर अधिक ध्यान न देकर वह ध्यान देते हैं विद्यालय में सुख सुविधाएं हैं जैसे बिल्डिंग कितनी बड़ी है ,एसी लगा हुआ है,  विद्यालय में बच्चों के पहुंचने के लिए बड़ी-बड़ी गाड़ियां हैं, विद्यालय का क्षेत्र में नाम है, विद्यालय में बच्चों की सप्ताह कि जो यूनिफार्म है वह कितने प्रकार की हैं,  सप्ताह में प्रत्येक दिन लंच बॉक्स मैं अलग-अलग प्रकार का खाद्य पदार्थ ले जाने का नियम है ,बच्चों के बैठने के लिए आरामदायक बेंच है आदि वह विद्यालयों के टीचर्स के विषय में कभी यह चर्चा नहीं करते हैं  की टीचर की योग्यता क्या है? उसका पढ़ाने का अनुभव क्या है? वह किस तरीके से पढ़ा रहा है? उस विद्यालय का रिजल्ट क्या था? बड़ी बड़ी बिल्डिंग के विद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ाने मैं वह अपनी शान समझते हैं वह बड़ी शान के साथ उस निजी विद्यालय का नाम अपने सगे संबंधियों को बताते हैं  यदि कोई उनका सगा संबंधी सरकारी विद्यालय में बच्चों का एडमिशन करा भी देता है तो उससे ऐसे प्रश्न किए जाते हैं की इतने पैसे का क्या करेगा ?क्या इस पैसे को छाती पर धर कर ले जाएगा ?क्यों बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हो? क्या इतना भी नहीं कमा पाते कि बच्चों को अच्छे विद्यालय में पढ़ा सको? क्या आज बच्चे को खाना नहीं मिला जो यह विद्यालय से जल्दी आ गया?  क्या आपने मिड-डे-मील वाले बच्चे को देखा? फलाना सर का इतना अच्छा वेतन है फिर भी यह सरकारी विद्यालय में अपने बच्चों को क्यों पढ़ाते हैं?  आप तो जागरूक हो फिर भी पता ना क्यों सरकारी विद्यालय में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं| इन सभी प्रश्नों से बचने के कारण सरकारी विद्यालयों में अभिभावक अपने बच्चों का नामांकन नहीं कराते हैं|
2:-गरीब का लेबल:- वर्तमान में तो स्थिति ऐसी हो गई है कि सरकारी विद्यालयोंके ऊपर गरीब एवं एक निश्चित समुदाय  से आने वाले बच्चों के शिक्षण प्राप्त करने का लेवल सा लग गया है |वर्तमान में स्थिति ऐसी हो गई है कि सरकारी स्कूलों में गरीब, मजदूर,ग्रामीण इलाकों तथा गंदी बस्तियों में अनुसूचित जनजाति, जनजाति पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के समुदाय से आने वाले बच्चे ही इन विद्यालयों में पढ़ाई करते दिखाई देते हैं| इनमें भी जो लोग शिक्षा का खर्च उठाने की क्षमता रखते हैं |वह भी अपने बच्चों को प्राइवेट विद्यालयों में भेजना पसंद करते हैं| यह सब हमारी छोटी मानसिकता एवं छोटी सोच के कारण हैं| इस आर्थिक भेदभाव के कारण ही निजी विद्यालय अपनी मनमानी कर रहे हैं तथा सरकारी विद्यालयों में नामांकन का स्तर लगातार गिरता जा रहा है जो किसी भी समाज तथा राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं है|
3 समाचार पत्रों में नकारात्मक खबरें:- आए दिन हमें समाचार एवं समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़ने तथा देखने को मिलता है कि फलाना विद्यालय के अध्यापक को पहाड़े तक नहीं आते हैं ,फलाने अध्यापक को देश के प्रधानमंत्री या राज्य के मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं बता पाया,फलाने अध्यापक सही से ए बी सी डी तक नहीं जानता है, फलाना अध्यापक अंग्रेजी वर्ड का सही से उच्चारण भी नहीं कर पाया आदि इस प्रकार की वीडियो हमें अक्सर देखने को मिलती हैं इस प्रकार की खबरें सरकारी विद्यालयों के अध्यापकों की योग्यता पर कहीं ना कहीं प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है| ऐसी वीडियो के बाद भला कौन इन विद्यालयों में अपने बच्चों का एडमिशन करा पाएगा?इस प्रकार की जो खबरें हैं जो विभिन्न चैनलों के माध्यम से आम आदमी के सामने बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत की जाती है उससे कहीं ना कहीं सरकारी विद्यालयों के नामांकन पर प्रभाव डालती हैं|
4 सुख सुविधाओं का अभाव:- निजी विद्यालयों की तुलना में सरकारी विद्यालय सुख-सुविधाओं के स्तर में काफी पिछड़े हुए हैं |सरकारी विद्यालयों में बच्चों के खेलने के लिए न तो उचित खेल का मैदान है और नए ही खेलने की सामग्री है न हीं टॉयलेटओं की उचित व्यवस्था है और यदि है भी तो उसकी स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है |सरकारी विद्यालयों में अक्सर साफ-सफाई का भी उतना ध्यान नहीं दिया जाता है जितना दिया जाना चाहिए |अरबों रुपए खर्च करने के बावजूद भी हम सरकारी विद्यालयों में छात्रों को सही से शैक्षिक माहौल उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं |चाहे मिड-डे-मील हो या फिर बच्चों की यूनिफार्म जो निशुल्क उपलब्ध कराई जाती है उसकी क्वालिटी भी किसी से छुपी हुई नहीं है| आए दिन मिड-डे-मील में कभी छिपकली निकलने की खबर ,तो कभी सांप निकल ने की खबर ,कभी बच्चों को एक किलो दूध में  दस किलो पानी मिलाकर बांटने की खबर मिलती रहती है ,कभी चावलों को नमक से खाने की खबर मिलती रहती है इन सब स्थितियों को देखकर लोगों के मन में मिड डे मील के प्रति एक अच्छी धारणा नहीं रही है| इन सभी स्थितियों का प्रभाव  विद्यालय के नामांकन पर पड़ता है|
5 शिक्षकों के रिक्त पद:- आए दिन समाचार पत्रों में शिक्षकों के रिक्त पदों के बारे में विभिन्न प्रकार की खबरें देखने को मिलती हैं कि पूरे देश में काफी शिक्षकों की कमी चल रही है |यदि किसी प्रदेश में शिक्षकों के पद निकलते भी है तो उनको भरने में ही लगभग दस दस साल लग जाते हैं |जिससे आम समाज में यह संदेश जाता है कि सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है | अब आम आदमी के दिमाग में यह प्रश्न उठता है कि जब विद्यालयों में शिक्षकों  के पद रिक्त हैं तो उन विद्यालयों में हमारे बच्चों को कौन पढ़आए गा  या हम अपने बच्चों को किसके भरोसे इन विद्यालयों में  नामांकन कराएं |जिसका सीधा प्रभाव सरकारी विद्यालयों के नामांकन पर पड़ता है|
6 शिक्षकों का शिक्षण कार्य के प्रति उदासीनता:- शिक्षकों का विद्यालय में केवल शिक्षण ही कार्य नहीं है इसके अतिरिक्त बच्चों को मिड डे मील बांटना, मतगणना में ड्यूटी देना ,मतगणना पहचान पत्र बनवाना ,यूनिफॉर्म बांटना, जनगणना करना आदि अध्यापक को जब इतने सारे कार्य करने पड़ते हैं तो वह जो उसका वास्तविक कार्य है  उसके प्रति उदासीन हो जाता है अधिकतर समय बच्चों को घर जैसे आए थे वैसे ही खाली हाथ लौटना पड़ता है| सीखने और सिखाने में काफी स्पेस आ गया है |सरकारी विद्यालयों में काफी अध्यापक ऐसे हैं जो विद्यालय में बिना जाए ही अपना वेतन प्राप्त करते हैं |जो अध्यापक विद्यालय में जा रहे हैं क्या वह पूर्ण इमानदारी से शिक्षण कार्य कर रहे हैं?अक्सर सरकारी विद्यालयों के अध्यापकों को आप धूप सेकते हुए देख सकते हैं |विद्यालय में सीखने सिखाने मैं स्पेस को खत्म करने के लिए कैमरे लगने चाहिए तथा उपस्थिति के लिए बायोमेट्रिक का प्रयोग होना चाहिए|
7 अधूरा बेसिक ज्ञान:- कितने ही उदाहरण देखने को मिले हैं कि कक्षा आठ के बच्चों को ने तो सामान्य गुणा, भाग ,जोड़ आते हैं और ना ही वह कक्षा पांचवीं की किताब को पढ़ पाते हैं स्थिति ऐसी आ गई है कि जो बच्चे इन सरकारी विद्यालयों में आते हैं वह केवल मिड डे मील खाने के लिए ही आते हैं तथा अध्यापक भी उन्हें पढ़ाने नहीं मिड-डे-मील खिलाने ही आते हैं ऐसी स्थिति भी देखी गई है कि मिड डे मील यूनिफॉर्म तथा वजीफा के पैसे के लिए एक बच्चे का एडमिशन कई कई विद्यालयों में भी पाया गया है ऐसी स्थिति में आप ही बताएं कि सरकारी विद्यालयों में नामांकन का स्तर गिरेगा या बढ़ेगा

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