समाज का अर्थ 1

सामान्यतः बोलचाल की भाषा में समाज को लोगों का समूह समझा जाता है  लेकिन यह लोगों का समूह ने होकर एक अमूर्त समाज होता है अमूर्त का अर्थ है जिसे देखा न जा सके, छुआ न जा सके  जिसे केवल  महसूस  किया जा सकता है क्योंकि मानव का कोई ना कोई उद्देश्य एवं आवश्यकताएं होती हैं और इन आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए वह एक दूसरे से अंतः क्रिया तथा  क्रिया प्रतिक्रिया के माध्यम से जुड़े होते हैं इस जुड़ाव के कारण इनके बीच में  विभिन्न प्रकार के संबंध स्थापित हो जाते हैं जैसे पति पत्नी, शिक्षक छात्र, नौकर मालिक, भाई बहन ,पिता-पुत्र आदि अतः लोगों के बीच संबंधों को ही समाज कहते हैं मैकाइवर एवं पेज ने कहा है समाज सामाजिक संबंधों का जाल है
समाज की कुछ परिभाषाएं निम्न प्रकार हैं -----
मैकाइवर एवं पेज के अनुसार-: समाज को सामाजिक संबंधों का जाल या ताने-बाने के रूप में परिभाषित किया जाता है
राइट के अनुसार-: समाज व्यक्तियों का समूह नहीं है, यह समूह में रहने वाले लोगों के मध्य संबंधों की व्यवस्था है
गिड्डिंग्स के अनुसार -:समाज सेवा संघ है, संगठन है, औपचारिक संबंधों का योग है जिस में सहयोग देने वाले व्यक्ति एक दूसरे के साथ जुड़े हुए या  संबंधित होते हैं
डॉ  जेम्स के अनुसार-: मनुष्य के शांतिपूर्ण संबंधों की अवस्था का नाम ही समाज है
डॉक्टर नागर के अनुसार ---समाज मनुष्यों ,स्त्रियों एवं बच्चों का स्थाई समूह है जिसका निर्माण एक दूसरे से अंतः क्रिया के माध्यम से विभिन्न सामाजिक संबंधों के आधार पर बनता है
उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि समाज लोगों का एक ऐसा समूह है जिनके मध्य किसी उद्देश्य को लेकर अंतर क्रिया या प्रतिक्रिया होती है जिसके आधार पर उनके मध्य विभिन्न प्रकार के संबंध बन जाते हैं व्यक्तियों के बीच बने इन संबंधों को ही समाज कहते हैं

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