एक आदर्श टीचर में क्या गुण होने चाहिए?

समाज में प्राचीन काल से ही शिक्षक का उच्च स्थान रहा है शिक्षक समाज का ,राष्ट्र का पथ प्रदर्शक एवं मार्गदर्शक होता है |शिक्षक में जो गुण होंगे उस समाज में रहने वाले लोगों के अंदर भी वही गुण होते हैं |शिक्षक समाज का शिल्पकार होता है| समाज में शिक्षक से काफी अपेक्षाएं होती हैं|बच्चों को समाज में किस प्रकार का व्यवहार करना है |उन्हें अपने जीवन जीने का सही ढंग यदि कोई इमानदारी से उन्हें सिखाता है तो वह शिक्षक ही है | किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था उसकी  शिक्षा नीतियों पर निर्भर करती है जिस देश की  शिक्षा नीति जितनी अच्छी होगी उस देश के नागरिक भी उतने ही अच्छे होंगे |यदि किसी देश की शिक्षा नीति एक बार को सही नहीं है तो अध्यापक में ही वह गुण है जो उस शिक्षा नीति से भी अच्छे परिणाम देने की शक्ति रखता है| शिक्षक ही वह प्राणी है जो शिक्षा देने के साथ-साथ बच्चों में नेतृत्व करने की शक्ति उन्हें सही से जीवन जीने का तरीका सिख लाता है |जिससे कि वह अपने जीवन में बड़ी से बड़ी परेशानी का डट के मुकाबला कर सकते हैं |मात-पिता बच्चों को जन्म देते हैं लेकिन शिक्षक बच्चों को यह सिखाते हैं कि इस जीवन का समाज तथा राष्ट्र के लिए किस प्रकार से सदुपयोग किया जा सकता है |जब कोई छात्र किसी उपलब्धि को प्राप्त करता है तो इस दुनिया में यदि सबसे ज्यादा उस उपलब्धि की खुशी किसी को होती है तो वह शिक्षक ही होता है| इसलिए शिक्षक को समाज में भगवान का दर्जा दिया जाता है| इसलिए शिक्षक का भी कर्तव्य बनता है कि इस गरिमा पूर्ण पद को सम्मान को बचाए रखने के लिए उसमें  निम्न गुण होने चाहिए:-
एक आदर्श शिक्षक में मुख्य रूप से चार गुण होते हैं:-
1 शैक्षिक गुण /योग्यता
2 व्यवसायिक संबंधी गुण 
3  व्यक्तित्व संबंधी गुण
4 संबंध स्थापित करने वाले गुण
1 शैक्षिक गुण से हमारा तात्पर्य  शिक्षा के किसी भी स्तर पर बच्चों को शिक्षण कराने के लिए सरकार ने जो योग्यता निर्धारित की उससे है जैसी प्राथमिक स्तर पर शिक्षक बनने की योग्यता 10 +2 तथा बी टी सी या इसके समतुल्य कोई अन्य डिग्री हो माध्यमिक स्तर पर शिक्षण करने के लिए योग्यता ग्रेजुएशन तथा बीएड या इसके समतुल्य कोई अन्य डिग्री हो इसी प्रकार इंटरमीडिएट विद्यालयों में शिक्षण करने के लिए पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री तथा B.Ed या इसके समतुल्य कोई अन्य डिग्री हो डिग्री कॉलेजों में मास्टर डिग्री तथा नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट पास तथा इसके साथ पीएचडी या अन्य समतुल्य डिग्री वाले व्यक्ति को ही शिक्षण कार्य करने के लिए योग्य समझा जाता है इससे कम डिग्री वाले व्यक्ति को शिक्षण कार्य  न करने दिया जाना चाहिए
2 व्यवसायिक संबंधित गुण :- शिक्षक में अपने व्यवसाय से संबंधित निम्न गुण होने अति आवश्यक है
A.सीखने तथा सिखाने के लिए सदैव तत्पर:- शिक्षक को यदि कोई  कांसेप्ट किसी से भी ,कहीं से भी सीखने को मिल रहा है उसे बिना झिझक के , पूर्ण उत्साह  के साथ सीखने का प्रयत्न करना चाहिए| जब तक अध्यापक सीखता रहता है तब तक उसमें नयापन बना रहता है तथा छात्रों को विभिन्न विधियों के माध्यम से ,विभिन्न अनुभवों के माध्यम  से सिखाने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए बच्चे जितनी बार पूछते हैं उन्हें उतनी बार बताते रहना चाहिए
B.विषय का पूर्ण ज्ञान:- जब से आई टी का जमाना आया है |तब से अध्यापक को और अधिक मेहनत की जरूरत पड़ी है |शिक्षक को अपने विषय से संबंधित जो भी नई नई जानकारी आ रही हैं |उनसे उन्हें समय-समय पर अवगत होना चाहिए अध्यापक को अपने विषय तो पूर्ण रूप से कमांड होनी ही चाहिए| उसके साथ साथ उसे अन्य विषयों की भी जानकारी होना अति आवश्यक है क्योंकि वर्तमान युग में बच्चे नहीं कंप्यूटर पैदा हो रहे हैं |उनको समझाने के लिए टीचर्स को अपने विषय का गहराई से जानकारी होनी चाहिए | वर्तमान युग कंप्यूटर का युग है |टीचर बच्चों को सतही ज्ञान के द्वारा अब बहका नहीं सकता |टीचर को जब अपने विषय की डीप नॉलेज होगी तभी वह बच्चों को संतुष्ट कर पाएगा और यह भी देखने को मिलता है कि जब अध्यापक को अपने विषय का पूर्ण ज्ञान होता है तो उस अध्यापक का प्रत्येक  छात्र दिल से मान सम्मान करता है तथा विद्यालय में भी अन्य अध्यापक उसका मान एवं सम्मान करते हैं| सही मायने में जब शिक्षक को अपने विषय का पूर्ण ज्ञान होता है तो वह कक्षा में पूर्ण विश्वास के साथ बच्चों को पढ़ा पाता है तथा उसके द्वारा दी गई शिक्षा बच्चों के दिमाग में लंबे समय तक रूकती भी है तथा बच्चे उसकी क्लास में रूचि भी लेते हैं तथा उस अध्यापक का काम भी समय से करते हैं|
C.  कंप्यूटर का ज्ञान:- प्रत्येक क्षेत्र में अब कंप्यूटर का प्रयोग किया जाता है किसी भी विषय के प्रोजेक्ट या असाइनमेंट अब बच्चे कंप्यूटर के द्वारा ही बनाते हैं इसलिए बच्चों को बताने के लिए कि वह कंप्यूटर पर किस प्रकार से अपने प्रोजेक्ट तैयार कर सकते हैं तथा अपने प्रोजेक्ट से संबंधित विषय सामग्री को किस प्रकार से सर्च कर सकते हैं |इन सभी का ज्ञान अध्यापक को होना अति आवश्यक है |असाइनमेंट का फ्रंट पेज किस प्रकार से अट्रैक्टिव बनाना है |वह सभी अध्यापक अपने छात्रों को तभी अच्छे से बता सकता है| |जब उस कंप्यूटर का अच्छा ज्ञान आता होगा |अब बहुत से काम कंप्यूटर पर ही होते हैं जैसे विभाग को बच्चों की अटेंडेंस भेजना ,बच्चों के मार्क्स ,विभिन्न प्रकार के सर्कुलर भी अब ऑनलाइन ही आते हैं |आज के जीवन में कंप्यूटर प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग बन गया है |इस दृष्टि से भी शिक्षक को कंप्यूटर का अच्छा ज्ञान होना चाहिए|
D.  कुशल वक्ता:- वही व्यक्ति कुशल शिक्षक हो सकता है |जिसको अपनी बात पूर्ण विश्वास के साथ कहनी आती है |वही व्यक्ति अपनी बात को सही तरीके से कह सकता है जो एक कुशल वक्ता होता है |इसलिए एक आदर्श शिक्षक बनने के लिए व्यक्ति को एक अच्छा वक्ता भी होना चाहिए क्योंकि जब बच्चों के सामने कोई समस्या आती है| शिक्षक उस समस्या से संबंधित विभिन्न उदाहरण प्रस्तुत कर समस्या का हल बच्चों के सम्मुख प्रस्तुत करता है |बच्चों में चारित्रिक ,नैतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक गुणों का विकास  तभी अच्छे से कर सकता है जब शिक्षक एक अच्छा वक्ता  होगा|
E.  मनोवैज्ञानिक हो:- कक्षा में जो बच्चे होते हैं वह विभिन्न परिवारों से, विभिन्न धर्मों से, विभिन्न जातियों, विभिन्न आयु वर्ग से आते हैं इसलिए छात्रों के सीखने की भी क्षमता भिन्न-भिन्न होती हैं कक्षा में कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो अध्यापक के एक बार किसी विषय वस्तु को पढ़ाने के बाद उनकी समझ में आ जाता है तथा कुछ बच्चे ऐसे होते हैं कि जिन्हें समझाने के लिए अध्यापक को एक से अधिक बार दोहराने की आवश्यकता होती है| कक्षा में कुछ बच्चे गृह कार्य को समय पर कर लाते हैं कुछ बच्चे काफी कहने के बाद करते हैं तथा कुछ बच्चे गृह कार्य को कभी भी करके नहीं लाते हैं कुछ बच्चे कक्षा में बड़े अनुशासन के साथ रहते हैं तो कुछ बच्चे कक्षा में अनुशासनहीनता करते रहते हैं अतः कक्षा में बच्चे अनुशासनहीनता क्यों करते हैं ?बच्चे समय से काम करके क्यों नहीं ला रहे हैं?बच्चों को एक से अधिक बार क्यों समझाना पड़ रहा है?बच्चे कक्षा से बंक क्यों मारते हैं?बच्चे गृह कार्य समय पर क्यों नहीं दिखा रहे?कक्षा में बच्चे चोरी क्यों करते हैं?बच्चे पढ़ाई से मन क्यों चुराते हैं?कुछ बच्चे कक्षा में सदैव पिछली बेंच पर ही क्यों बैठना पसंद करते हैं?बच्चों का अनैतिक कार्यों की तरफ झुकाव क्यों है? उपरोक्त प्रश्नों का सही एवं सरल हल निकालने के लिए शिक्षक को मनोवैज्ञानिक विधियों का ज्ञान होना अति आवश्यक है तभी शिक्षक अपने शिक्षण कार्य को सही प्रकार से कर सकता है|

F. शिक्षण विधियों का ज्ञान:- वर्तमान में शिक्षा अध्यापक केंद्रित न होकर छात्र केंद्रित हो गई है सरकारी जितनी भी शैक्षिक नीतियां बना रही हैं उसमें बच्चे को ही केंद्र मे रख कर बनाई जा रही हैं शिक्षक के सामने शिक्षण कार्य को प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ समस्याएं उसके सामने आती हैं जैसे कमजोर बच्चों को कैसे पढ़ाया जाए?बच्चों में गणित के प्रति जो भय है उसे कैसे समाप्त किया जाये? कठिन प्रश्नों को कैसे समझाया जाए?बच्चे कक्षा से एब्सेंट क्यों रहते हैं ?बच्चे शिक्षक का आदर क्यों नहीं करते? कक्षा में सबसे पहले क्या पढ़ाया जाए?बच्चों के परीक्षा में अच्छे अंक कैसे आएं ?कक्षा का वातावरण रूचि पूर्ण कैसे बनाया जाए ?बच्चे शिक्षण कार्य में उत्साह कैसे दिखाएं? शिक्षक ऐसा क्या करें जिससे उसके द्वारा जो शिक्षण किया गया है वह मीनिंग फुल हो? शिक्षक ऐसा क्या करें जिससे कि बच्चे शिक्षण प्रक्रिया को भार न समझें?
बच्चों को स्थाई  ज्ञान देने के लिए शिक्षक क्या करें? कठिन से कठिन विषय को भी शिक्षक सरल कैसे बनाएं? कक्षा में छात्र रेगुलर कैसे आए? स्थाई ज्ञान देने के लिए शिक्षक को क्या करना चाहिए? इन सभी प्रश्नों का उत्तर वही शिक्षक अच्छी प्रकार से दे सकता है जिसको शिक्षण की विधियों का अच्छे से ज्ञान होगा| शिक्षण एक कला है| अतः जिस शिक्षक को शिक्षण की विधियों का ज्ञान होता है तथा किस विधि का प्रयोग कहां करना चाहिए| जब अध्यापक को यह मालूम होता है तो अध्यापक का शिक्षण कार्य निश्चित रूप से प्रभावशाली ,रोचक और सरल होता है|
G. मातृभाषा में शिक्षण:- प्राथमिक स्तर पर बच्चों की जो मातृभाषा होती है अध्यापक को भी उस मातृभाषा का ज्ञान होना चाहिए तथा शिक्षण प्रक्रिया में भी बच्चों को मातृभाषा में ही सीखने के अवसर उपलब्ध कराने चाहिए क्योंकि बच्चे जितना सरलता से मातृभाषा में सीखते हैं अन्य भाषा में नहीं सीख सकते है| क्योंकि बच्चा 24 घंटे में से केवल विद्यालय में 5 से 6 घंटे रहता है और बाकी बचे हुए घंटे परिवार के सदस्यों के साथ ही रहता है| परिवार की जो भाषा होती है उसे वह बहुत अधिक सीखता है| उसी में ही जीता है इसलिए जब उसे उसकी परिवार की भाषा में सिखाया जाएगा तो निश्चित रूप से सीखेगा| आप समझ सकते हैं कि जब किसी मकान की नींव मजबूत होती है  तो उस मकान के ऊपर आप जितनी चाहे उतनी मंजिल बिना किसी डरे बना सकते हो| यही बात बच्चे की शिक्षा की है मातृभाषा में उसे शिक्षा देकर जो उसका बेस बना दिया जाता है वह लंबे समय तक काम आता है|
H. सिखाने की अंदर से जिज्ञासा:- जब व्यक्ति के अंदर किसी काम को  करने की अंदर से जिज्ञासा होती है | व्यक्ति उस कार्य में सफलता के कीर्तिमान स्थापित करता चला जाता है |जब शिक्षक सिखाने के लिए सदैव तत्पर रहता है उसके अंदर एक जिज्ञासा होती है कि मैं अधिक से अधिक जो मेरे अंदर ज्ञान है उसे दूसरों तक पहुंचाओ तो निश्चित रूप से वह समाज में एक बड़ा बदलाव लाने का कार्य करता है | उसके द्वारा किया गया कार्य प्रभावशाली होता है छात्र भी ऐसे अध्यापक की बातों पर ध्यान देते हैं |अपने जीवन में उनके द्वारा दी गई शिक्षा को उतारने का प्रयास करते हैं छात्र भी ऐसे शिक्षक का मान सम्मान करते हैं|
I. स्व एक उदाहरण:- महात्मा गांधी जी ने अपनी पुस्तक सत्य के प्रयोग  मैं सही बताया है कि जो कार्य हम स्व करते हैं |उसको हम बच्चों से करने से कैसे मना कर सकते हैं ?यदि मना करते भी हैं तो बच्चों पर उस बात का प्रभाव नहीं  पड़ेगा| बच्चे अध्यापक को अपना रोल मॉडल मानते हैं | शिक्षक जो बच्चों से चाहता है पहले वह परिवर्तन स्वयं अपने आप में करें |निश्चित रूप से वह अध्यापक समाज में बहुत बड़ा बदलाव करने का दमखम रखता है |यदि आप चाहते हैं कि आपके बच्चे कक्षा में कठिन कार्य करें तो आपको भी उनको शिक्षण कराने में कठिन कार्य करना पड़ेगा |आप चाहते हैं कि आप की कक्षा के बच्चे अनुशासन में रहें तो पहले आपको यह दिखाना पड़ेगा कि मैं स्वयं भी अनुशासन में रहता हूं |आप चाहते हैं कि आपके बच्चे विद्यालय में समय से आएं तो आपको भी विद्यालय एवं उनकी कक्षा में समय से पहुंचना पड़ेगा| जितना आप बच्चों के सामने अपने आप को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करोगे उतने ही परिणाम आपको  सकारात्मक मिलेंगे|
J. पाठ्य सहगामी क्रियाओं में रुचि:- शिक्षक को विषय में रुचि लेने के साथ-साथ विद्यालय में जो पाठ्य सहगामी क्रियाएं होती हैं| उनमें भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए यदि विद्यालय में खेलकूद की प्रतियोगिता हो रही है तो उसमें प्रत्येक शिक्षक को बढ़-चढ़कर भाग लेना चाहिए|अध्यापक पाठ्य सहगामी क्रियाओं में रुचि रखता है तो निश्चित रूप से वह बच्चों को उन सभी पाठ्य सहगामी क्रियाओं को कराने में भी उसको आनंद आएगा तथा वे अधिक से अधिक बच्चों को  पाठ्य सहगामी क्रियाओं में रुचि लेने के लिए तैयार भी कर पाएगा | विद्यालय का माहौल भी सकारात्मक तथा काफी खुशनुमा रहेगा |ऐसे माहौल में बच्चे अधिक से अधिक सीखने का प्रयास भी करते हैं |उनका मन विद्यालय में अधिक से अधिक लगता है और बच्चे अनुशासन में भी रहने का प्रयास करते हैं| इसलिए विद्यालय में समय-समय पर अधिक से अधिक पाठ्य सहगामी क्रियाएं कराते रहना चाहिए ,यह तभी संभव हो पाएगा जब शिक्षक सभी पाठ्य सहगामी क्रियाओं में रुचि लेता है|
K. उदाहरणों के माध्यम से शिक्षा:-  अध्यापक कक्षा में बच्चों से यह पूछता है कि राम के पास पांच केले हैं तथा श्याम के पास दो केले हैं तो बताइए दोनों के पास कितने केले हैं ? छात्र उत्तर देते हैं फिर अध्यापक बच्चों से पूछता है कि राधा के पास पांच आम थे  उसमें से राधा ने दो आम गीता को दे दिए तो बताइए राधा के पास कितने आम बचे ?बच्चे अपना अपना उत्तर बताते हैं इस प्रकार विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से शिक्षक बच्चों को जोड़ तथा घटाओ करना सिखा रहा है इस प्रकार के शिक्षण में बच्चे अधिक से अधिक रूचि लेते हैं | इस प्रकार का जो ज्ञान बच्चों को दिया जाता है वह स्थाई होता है |इसलिए जो अध्यापक अपने विषय वस्तु को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से समझाने का प्रयास करता है |उसका शिक्षण प्रभावशाली होता है| उदाहरणों के माध्यम से बच्चों को विषय वस्तु का कांसेप्ट सही प्रकार से समझ में आ जाता है |बच्चे उसे  रटने के बजाय समझने का प्रयास करते हैं |
L. दृश्य श्रव्य सामग्री का प्रयोग:- हमें वह चीजें अधिक ध्यान रहती हैं जिन्हें हम अपनी आंखों से देख लेते हैं| इसलिए अध्यापक को अपने शिक्षण कार्य में अधिक से अधिक विषय वस्तु को दृश्य श्रव्य सामग्री के माध्यम से बच्चों के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए| आप देख सकते हैं कि जब आप किसी पर्यटक स्थल का भ्रमण कर आते हैं | आपसे उस पर्यटक स्थल के बारे में एक नोट  लिखवाया जाने लगे तो आप उस पर आसानी से लिख सकते हैं | उसी पर्यटक स्थल के बारे में शिक्षक कक्षा में लेक्चर देता है और लेक्चर देने के बाद बच्चों से उस पर्यटक स्थल पर एक नोट लिखने के लिए बोलता है तो बच्चे उतना अच्छा लेख उस पर्यटक स्थल पर नहीं लिख पाते हैं जितना अच्छा लेख वे उस पर्यटक स्थल के बारे में लिख देते हैं जिससे वह अपनी आंखों से देख कर आए हैं| उसमें बच्चों को रटने की आवश्यकता नहीं है जिसको शिक्षक द्वारा कक्षा में पढ़ाया गया है |उसमें बच्चों को रटने की आवश्यकता है आप  स्वयं ही समझ सकते हैं कि दोनों में से निश्चित रूप से जिस पर्यटक स्थल को आप देखकर आए थे उसे अधिक समय तक आप याद रख सकते हैं |इसलिए अध्यापक को अधिक से अधिक दृश्य श्रव्य सामग्री का प्रयोग कर विषय वस्तु को पढ़ाना चाहिए|
M. प्रेरित करने की क्षमता:- यह एक शिक्षक में सबसे बड़ा गुण है जिस शिक्षक में अपने छात्रों को प्रेरित करने की जितनी अधिक क्षमता होती है |उस अध्यापक का शिक्षण कार्य उतना ही अधिक प्रभावशाली एवं सकारात्मक होता है| क्योंकि प्रेरणा सीखने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग होता है| प्रेरणा एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति को जीरो से हीरो बना देता है| प्रेरणा ऐसा गुण है यह व्यक्ति को तब तक सोने नहीं देता है जब तक उसे उसका लक्ष्य प्राप्त नहीं होता है| प्रेरणा सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों हो सकती है लेकिन हमें सदा अपने जीवन में सकारात्मक प्रेरणा का अनुसरण करना चाहिए|
N. शिक्षण के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित:- वर्तमान में ऐसी परिस्थिति है कि शिक्षक शिक्षण कार्य को केवल एक नौकरी के रूप में देखता है जबकि शिक्षण केवल एक नौकरी ही नहीं है, शिक्षण एक कला है, एक सामाजिक कर्तव्य है ,शिक्षा दान है| जब तक आप  शिक्षण के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित नहीं होगे तब तक आप समाज में जो बदलाव चाहते हो वह बदलाव नहीं  कर पाओगे |सकारात्मक बदलाव लाने के लिए शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य में पूर्ण रूप से लगन लगा कर कार्य करना होगा तभी हम एक अच्छे राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं|
O. पूर्ण एवं पूर्व तैयारी के साथ कक्षा में शिक्षण कार्य:- शिक्षक को विषय वस्तु तथा नवीनतम जानकारी के साथ पूर्ण रूप से तैयार होकर कक्षा में जाना चाहिए| जिससे कि छात्र अपनी जिन समस्याओं को शिक्षक से पूछता है वह उन्हें आत्मविश्वास के साथ हल कर सके| ऐसी अध्यापक का विद्यालय के छात्र भी मान सम्मान करते हैं | अध्यापक भी कक्षा में आत्मविश्वास से लबालब रहता है|
3. व्यक्तित्व संबंधी गुण:- शिक्षक में व्यक्तित्व संबंधी गुण निम्न होने चाहिए -
1. शिक्षक धैर्यवान हो 2.अनुशासन प्रिय हो 3.कुशल वक्ता हो 4.प्रेरित करने वाला हो 5.समय का पाबंद हो 6.नेतृत्व शक्ति का सागर हो 7.अच्छा स्वास्थ्य वाला हो 8.हंसमुख हो 9.अच्छा सलाहकार हो 10. चरित्रवान हो 11 .आतम संयमी हो 12.व्यक्तित्व शांत धीर गंभीर हो 13.छात्रों के प्रति प्रेम एवं सहानुभूति रखने वाला हो 14.अच्छी वेशभूषा पहनने वाला हो 15.मित्रों का भी मित्र  हो 16. सामाजिक हो|
4. संबंध स्थापित करने  का गुण:- शिक्षक में संबंध स्थापित करने के निम्न गुण होने चाहिए -
1. विद्यार्थियों से संबंध:- वर्तमान युग में देखा जा रहा है कि छात्र और शिक्षक के जो संबंध हैं वह विशेष अच्छे नहीं होते हैं| इसका कारण है कि शिक्षक अपना कार्य शिक्षण न समझ कर एक नौकरी समझ रहा है|  छात्र यह समझ रहा है कि शिक्षक हमारे ऊपर कोई एहसान नहीं कर रहा उसके बदले में हम उसे आर्थिक  मूल्य  देते हैं| शिक्षक तथा छात्र  दोनों को इस संकीर्ण मानसिकता को छोड़कर दोनों के बीच में संबंध मित्र, भाई, अभिभावक जैसे होने चाहिए| तभी हम अपने सही मायने में अपने उद्देश्यों को पूर्ण कर पाएंगे|
2. साथी अध्यापकों के साथ संबंध :- एक अच्छे शिक्षक  का अपने साथी अध्यापकों के साथ मधुर संबंध होनी चाहिए|विद्यालय में वह अपने कर्तव्यों को सही रूप से निर्वाह कर पाता है |जब शिक्षक का अपने शिक्षक साथियों के साथ अच्छा तालमेल होगा तभी वह अपने शैक्षिक उद्देश्यों को सकारात्मक रूप से पूर्ण कर पाता है| विद्यालय में भी  शिक्षण का अच्छा माहौल बना पाता है | यदि आपका अपने शिक्षक साथियों से अच्छे संबंध नहीं है तो निश्चित रूप से वह कहीं ना कहीं आप के शिक्षण कार्य को प्रभावित करते हैं |इसलिए शिक्षक में अपने शिक्षक साथियों के साथ अच्छे संबंध रखने का गुण भी होना चाहिए|
3. प्रधानाचार्य के साथ संबंध:- एक आदर्श शिक्षक का अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य जी के साथ अच्छे संबंध होनी चाहिए| क्योंकि यदि आपके अपने प्रधानाचार्य जी के साथ अच्छे संबंध नहीं है तो आप विद्यालय में अच्छी प्रकार से शिक्षण कार्य नहीं कर पाओगे| सफल शिक्षण कार्य के लिए शिक्षक तथा प्रधानाचार्य जी के बीच में कोआर्डिनेशन होना बहुत जरूरी है| यह कोआर्डिनेशन तभी हो सकता है जब दोनों के बीच में मधुर संबंध हैं| विद्यालय की चारदीवारी के अंदर शैक्षिक माहौल तभी रह सकता है| जब इन दोनों के मध्य अच्छे संबंध होंगे फतेह शिक्षक को किसी राजनीति मैं न पडकर केवल अपने शैक्षिक कार्य में मन लगाए तथा अपने विद्यालय के प्रधानाध्यापक से सदैव कोऑर्डिनेशन बनाकर चले इसी में छात्रों की विद्यालय की तथा अध्यापक की भलाई है|
4. अभिभावकों से संबंध:- एक आदर्श शिक्षक के छात्रों के अभिभावकों के साथ भी अच्छे संबंध होने चाहिए तथा बीच-बीच में शिक्षक को छात्रों के अभिभावकों से मिलते रहना चाहिए |जब अध्यापक छात्रों के अभिभावकों से समय-समय पर मिलते रहते है |इससे शिक्षक को अपने छात्रों की घर पर जो उनका व्यवहार है उसकी समय समय पर पता चलती रहती है |जिसके आधार पर वह अपने शिक्षण कार्य को करता रहता है | जिस अध्यापक के अभिभावकों से अच्छे संबंध होते हैं वह छात्र शिक्षक की अधिकतर बातों को मानते भी हैं|  कक्षा में शिक्षण कार्य में पूर्ण रुचि लेते हैं, उनका परीक्षा परिणाम भी बहुत अच्छा आता है| विद्यालय में बच्चे भी अनुशासन में रहते हैं |समय पर कक्षा का कार्य अपने अध्यापक को दिखाते हैं| विद्यालय में भी समय से पहुंचते हैं |कक्षा से बंक भी नहीं मारते हैं |आपस में लड़ाई झगड़ा भी नहीं करते हैं| अभिभावक अपने बच्चों में क्या परिवर्तन चाहते हैं ?क्या बच्चे घर पर पढ़ाई करते हैं ?क्या बच्चे बड़े बुजुर्गों का मान सम्मान करते हैं ?क्या बच्चे नैतिक मूल्यों का अनुसरण करते हैं? अभिभावक कि अपने बच्चे से क्या अपेक्षा है? बच्चों का घर का माहौल कैसा है? छात्रों की घर की स्थिति कैसी है ?क्या छात्रों के घर पर शैक्षिक माहौल है? क्या छात्र घर पर अनुशासन में रहते हैं ? छात्रों की मित्र मंडली कैसी है? अभिभावकों की अपने बच्चों से क्या अपेक्षाएं हैं? उपरोक्त सभी प्रश्नों का सकारात्मक रूप से निदान शिक्षक तभी कर सकता है जब उसका अभिभावकों के साथ मधुर संबंध होंगे|
5. समाज के साथ संबंध:-एक आदर्श शिक्षक का समाज में रहने वाले लोगों के साथ मधुर संबंध होने चाहिए| समाज में कैसी शिक्षा की आवश्यकता है? समाज में क्या कुर्तियां हैं? समाज की क्या-क्या सामाजिक समस्याएं हैं? समाज छात्रों से क्या चाहता है? समाज शिक्षक से क्या चाहता है? समाज विद्यालयों से क्या चाहता है? समाज में क्या परिवर्तन हो रहा है? समाज क्या परिवर्तन चाह रहा है? समाज की शिक्षक से क्या अपेक्षाएं हैं?  समाज की संस्कृति क्या है? समाज के क्या सामाजिक मुद्दे हैं? समाज के नैतिक मूल्य क्या है?  इन सभी प्रश्नों का सकारात्मक रूप से निराकरण अध्यापक तभी कर सकता है जब अध्यापक के समाज के साथ मधुर संबंध होंगे|
अतः हम कह सकते हैं कि एक शिक्षक में जब उपरोक्त गुण होंगे तभी समाज उस शिक्षक को एक आदर्श शिक्षक के रूप में देख सकता है

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