निजी शिक्षण संस्थाएं : नोट छापने के कारखाने
प्राचीन कालसे ही शिक्षण संस्थाओं को शिक्षा के मंदिर के रूप में जाना जाता रहा है |शिक्षा के मंदिरों का निर्माण देश के बच्चों को कम से कम फीस पर उचित शिक्षा प्रदान करना होता था |जब देश आजाद हुआ था तो उस समय देश में शिक्षा की स्थिति निम्न स्तर की थी| आपने बड़े बुजुर्गों को अक्सर कहते सुना होगा कि देश में शिक्षा के प्रचार-प्रसार एवं विद्यालयों के निर्माण के लिए लोगों ने चंदा एकत्रित कर देश के कोने कोने में शिक्षा के मंदिरों का निर्माण सामूहिक रूप से किया था| उस समय शिक्षकों को उनका वेतन सामूहिक दान के रुपये पैसे से ही दिया जाता था| शिक्षा के मंदिरों का निर्माण का मुख्य उद्देश्य केवल सभी वर्गों के बच्चों को शिक्षा देना होता था |वह भी कम से कम फीस पर जिसे सभी वर्गों के लोग आसानी से दे सकते थे| देश के आजाद होने से लेकर लगभग 90 के दशक तक शिक्षा के मंदिरों में काफी चहल-पहल देखने को मिलती है इस प्रकार दान से चलने वाले तथा सरकारी विद्यालयों का अपना अलग जलवा होता था| इन विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करके अनेकों छात्रों ने देश के विभिन्न पदों को सुशोभित किया है |
90 के दशक के प्रारंभ में सरकार ने साक्षरता दर में तेजी लाने के उद्देश्य से शिक्षा का निजी करण करने का निश्चय किया तभी से जो शिक्षा बेची एवं खरीदी नहीं जाती थी वह बाजार में वस्तु के समान बेची एवं खरीदी जाने लगी और तभी से जनहित में चलने वाले सरकारी शिक्षण संस्थाओं के बुरे दिन चलने लगे और 21वीं सदी के आते-आते निजी शिक्षण संस्थाएं, संस्थापकों के लिए नोट छापने के कारखाने बनने लगे हैं |आलम यह हो गया है कि उद्योगपति भी धीरे धीरे अपने कारखानों को बंद करके फाइव स्टार होटल जैसी शिक्षण संस्थाएं खोलने लग गए क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में कम पूंजी एवं कम सिर दर्दी के साथ अधिक मुनाफा होता है|
वर्तमान में तो निजी शिक्षण संस्थाओं की स्थिति ऐसी हो गई है कि किसी परिवार की आय का एक बड़ा हिस्सा निजी विद्यालयों में फीस के नाम पर या अन्य सेवा शुल्क के रूप में लिया जाता है| अभिभावकों को विद्यालयों से है यूनिफॉर्म एवंपुस्तकें खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है| वह भी मार्केट मूल्य से छह से सात गुना अधिक मूल्य पर खरीदने के लिए आम आदमी को मजबूर करते हैं और सबसे बड़ा खेल यह है कि प्रत्येक वर्ष यह अपनी यूनिफॉर्म एवं पाठ्यक्रम बदल देते हैं| इसका कारण केवल और केवल अभिभावकों से एक मोटी रकम प्रत्येक वर्ष लूटना है|
निजी शिक्षण संस्थाओं में फीस का तो कोई मानक है ही नहीं और यदि सरकार ने कोई मानक बना रखा है तो उन्हें उस मानक को मानना नहीं है आलम यह है कि जिस शिक्षण संस्थान की जितनी बड़ी बिल्डिंग उसकी उतनी अधिक फीस होती है एक सामान्य निजी विद्यालय की प्रतिमाह फीस कम से कम पांच हजार से शुरुआत होती है इससे ऊपर कोई निश्चित सीमा नहीं है यह तो सभी को पता है कि निजी शिक्षण संस्थाओं की फीस महंगी होती है लेकिन इसकी कोई तो सीमा होगी वर्तमान में तो शिक्षण संस्थाओं ने कभी अटेंडेंस शुल्क, परीक्षा शुल्क, प्रवेश शुल्क, शैक्षिक भ्रमण शुल्क, वार्षिक उत्सव शुल्क, बिल्डिंग शुल्क, गाड़ी शुल्क, समर कैंप शुल्क ,कैंपस सिलेक्शन शुल्क ,वार्षिक शुल्क, प्रोजेक्ट वर्क शुल्क ,आई कार्ड शुल्क, क्रीड़ा शुल्क, प्रवेश पत्र शुल्क प्रैक्टिकल शुल्क, लैब शुल्क आदि के नाम पर खुली लूट मचा रखी है यदि इस लूट के खिलाफ कोई आवाज उठाता है तो उसे श्याम दाम दंड भेद के आधार पर दबा दिया जाता है
आलम यह है कि प्रत्येक वर्ष 20 से 30% फीस में वृद्धि कर दे कर देते हैं जबकि इन शिक्षण संस्थानों को सरकार जमीन बाजार रेट से काफी कम मूल्य एवं मान्यता इस शर्त पर देती है कि आपकी संस्था जिस क्षेत्र में खुल रही है| उस क्षेत्र के गरीब, मजदूर ,किसान एवं निम्न वर्ग के बच्चों को प्रत्येक कक्षा या कोर्स में लगभग 10 से 20 प्रतिशत बच्चों को कम से कम शुल्क पर शिक्षा प्रदान करोगे परंतु यह कागजों में तो गरीब, मजदूर ,किसान एवं निम्न वर्ग के बच्चों को निशुल्क या कम से कम शुल्क पर शिक्षा प्रदान करते मिलेंगे |यदि आप धरातल पर जाकर देखोगे तो आपके हाथ निराशा ही लगेगी| वैसे कुछ अपवाद तो आपको हर क्षेत्र में देखने को मिलेंगे| एक खेल इन शिक्षण संस्थाओं में और खेला जाता है और वह खेल है अपनी शिक्षण संस्था को परीक्षा केंद्र बनवाने का इसके पीछे इनका लालच यह है कि यह केंद्र पर बच्चों से नकल के नाम पर मोटी फीस वसूलते हैं ऐसी शिक्षण संस्थाओं को शिक्षण संस्थान ने कहकर फाइव स्टार होटल बोला जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |यह ऐसा उद्योग धंधा है कि इसमें एक बार व्यय करके फिर चाहे आंधी या तूफान आए या फिर कड़ाके की ठंड पड़े या जबरदस्त गर्मी का प्रकोप हो इनकी आय पर कोई फर्क नहीं पड़ता है अगर हमारे बच्चे यूं ही लूट खसूट के माहौल में शिक्षा ग्रहण करते रहेंगे तो आगे चल कर हम अपने बच्चों से क्या ईमानदार नागरिक की कल्पना कर सकते हैं ?वह भी आगे चलकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देंगे इसकी क्या गारंटी है? जाहिर है हम एक भ्रष्ट संस्कृति को जन्म दे रहे हैं| शिक्षा मंत्रालय से लेकर तमाम सरकारी शैक्षिक महकमों को इस तरफ इमानदारी से ध्यान देना चाहिए ताकि निजी शिक्षण संस्थाओं के द्वारा चल रही लूट से आम आदमी राहत मिल सके|
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