समाज में सरकारी विद्यालयों के प्रति बदलता दृष्टिकोण

देश के आजाद होने से लेकर लगभग 90 के दशक तक सरकारी विद्यालयों में काफी चहल-पहल तथा शिक्षा की गुणवत्ता भी बनाए हुए थे| सरकारी विद्यालयों पर जनता का काफी विश्वास था |लेकिन सन 1986 की शिक्षा नीति के आने के बाद देश में साक्षरता दर को बढ़ाने के लिए निजी शिक्षण संस्थाओं को शिक्षा में भागीदारी दी गई तभी से सरकारी शिक्षण संस्थाओं के बुरे दिन शुरू होने लगे| इसका मुख्य कारण सरकारी विद्यालय निजी विद्यालयों के सामने बौने साबित हो रहे हैं निजी विद्यालयों में जो सुख सुविधाएं बच्चों को उपलब्ध हो रही हैं उसका 10% भी सरकारी विद्यालयों में देखने को नहीं मिलता है |निजी विद्यालयों में प्रत्येक महा टीचर अभिभावक मीटिंग का आयोजन किया जाता है तथा पूरे महीने की जो बच्चे की परफॉर्मेंस होती है उसको अभिभावक को बताया जाता है तथा उसी आधार पर बच्चे के लिए आगे की व्यू रचना तैयार की जाती है| लेकिन सरकारी विद्यालयों में ऐसा कुछ भी नहीं है| अधिकतर परीक्षाओं में एनसीईआरटी सिलेबस से पूछा जाता है क्योंकि सरकारी विद्यालयों में एनसीईआरटी सिलेबस नहीं लगाया गया है जिससे इन विद्यालय के छात्र को यदि कोई नौकरी प्राप्त करनी है  तो वह पुनः एनसीईआरटी सिलेबस को पढ़ने के लिए  मजबूर होते हैं  भारत में  सरकारी विद्यालयों के प्रति लोगोंं का  जो नजरिया बदला है उसके मुख्य कारण निम्न  है

1.ग्रामीण क्षेत्रों में में शिक्षा के लिए मूलभूत सुविधाओं की स्थिति अत्यंत खराब है। यहां पर कक्षा के कमरे, प्रयोगशालाएं, शौचालय, फर्नीचर, ब्लैक बोर्ड, खेल के मैदान एवं पीने की पानी की सुविधाएं नहीं हैं और अगर हैं भी तो बहुत खराब स्थिति में हैं 

2 लड़कियां स्कूलों में सुरक्षित नहीं हैं एवं उनके शौचालयों की व्यवस्था या तो विद्यालयों में नहीं है या बहुत खराब स्थिति में है। इस कारण माता-पिता लड़कियों को इन विद्यालयों में भेजने में हिचकते हैं।

3 सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है, यहां तक कि शहरी क्षेत्रों में भी विषयवार शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं विशेषकर गणित, विज्ञान एवं अंग्रेजी के शिक्षकों की कमी शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में आड़े आ रही है। 

 4. सरकारी स्कूलों में बच्चे उपस्थित नहीं रहते, क्योंकि माता-पिता बच्चे का नाम लिखवाकर उसे स्कूल भेजने की बजाय अपने साथ मजदूरी पर ले जाते हैं एवं कभी-कभार ही वह विद्यालय आता है।

 5. शिक्षकों का अध्यापन में उत्साहपूर्वक हिस्सा न लेना भी सरकारी स्कूलों में गिरते शिक्षा के स्तर का एक प्रमुख कारण है। 

6. शिक्षकों को गैर-शिक्षकीय कार्यों जैसे चुनाव, सर्वे, जनगणना, मध्याह्न भोजन, पशुगणना इत्यादि कार्यों में लगाया जाता हैं जिससे उनका अध्यापन क्रम टूट जाता है। 

7. पाठ्यक्रम विसंगतिपूर्ण एवं छात्रों के मानसिक स्तर से कहीं अधिक कठिन होता है जिससे उनका मन पढ़ने में नहीं लगता एवं कई पाठ्यवस्तुएं उनकी समझ से बाहर होती हैं। 

8. मूल्यांकन का तर्क शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के अनुरूप नहीं है। सरकारी स्कूलों में रटकर पाठ याद कर लेना ही परीक्षा में सफलता की निशानी होता है। 

9. अधिकांश छात्र गरीब मजदूर परिवार के होते हैं अत: उनके माता-पिता या तो निरक्षर या बहुत कम पढ़े-लिखे होते हैं जिससे वे छात्रों की मानसिक स्तर पर कोई सहायता नहीं कर पाते हैं। 

10. अधिकांश राज्यों में शिक्षकों के कई संवर्ग बनाकर उन्हें कम वेतन पर रखा गया है जिससे उनके मन में असंतोष है एवं इसका प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता पर स्पष्ट नजर आता है। 

11. राजनीतिज्ञों एवं नौकरशाहों का नजरिया ग्रामीण विद्यालयों के प्रति निराशाजनक है। 

 12. सरकारी विद्यालयों में आय के कोई स्रोत नहीं हैं। वित्तीय कमी मूलभूत सुविधाओं को जुटाने में आड़े आती है। 

सरकारी स्कूलों की यह दुर्दशा देखकर सरकारें पूरी शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रही हैं। शिक्षा को निजी हाथों में देना इसका हल नहीं है। निजीकरण करने से ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के शिक्षण के बीच खाई और बढ़ जाएगी। निजीकरण से शिक्षा महंगी होगी एवं गरीब मजदूर बच्चे शिक्षा से वंचित होंगे।शिक्षा अधिनियम के अंतर्गत कमजोर एवं शोषित वर्गों के बच्चों को निजी विद्यालयों में सीटों का आरक्षण एक अच्छा कदम है। इसमें शहरी क्षेत्रों के कमजोर व शोषित वर्ग के बच्चों को अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के अवसर मिले हैं। किंतु ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों का अच्छी शिक्षा प्राप्त करना अभी भी दिवास्वप्न है। इसके लिए सरकारों को ऐसे प्रयत्न करना चाहिए जिसमें सरकारी विद्यालयों में निवेश की संभावनाएं बढ़ें।

सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर बढ़ाने के लिए शिक्षकों को अभिप्रेरित करने की आवश्यकता है। ऐसे शिक्षक जो मेहनत करके बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं, उन्हें पदोन्नति एवं वेतनवृद्धियों का लाभ शीघ्रता से दिया जाए। बच्चों की उपस्थिति स्कूलों में सुनिश्चित कराई जाए। छात्रों की दक्षता की जांचने के लिए कोई प्रभावशाली मूल्यांकन पद्धति विकसित की जाए जिससे छात्र एवं शिक्षक दोनों का समग्र मूल्यांकन हो अंत में, हमें सरकारी विद्यालयों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा तथा उन गरीब बच्चों की शिक्षा के प्रति सहानुभूतिपूर्वक सोचने  पड़ेगा

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